मुफ़्लिसी ने जा-ब-जा लूटा हमें
अब बचा कुछ भी नहीं लुटवाएँ क्या
बाबर रहमान शाह
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थकन से चूर है सारा वजूद अब मेरा
मैं बोझ इतने ग़मों का तो ढो नहीं सकता
बाबर रहमान शाह
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आँसू से नदी बने नदी समुंदर जाए
पर्बत का रोना मगर कोई देख न पाए
बदनाम नज़र
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जन्नत और जहन्नम का रेल खेल दिखलाए
इक डब्बे में आग रहे दूजा बर्फ़ जमाए
बदनाम नज़र
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केवट चप्पू हाथ लिए अचरज में पड़ जाए
शाएर काग़ज़ की नय्या कैसे पार लगाए
बदनाम नज़र
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खेल सियासत का बिल्ली से अब तो सीखा जाए
चूहों के वो प्राण ले पर मासी कहलाए
बदनाम नज़र
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या बच्चे जन्ती रहे या सास की गाली खाए
बेटी जब बहू बने इक पल चैन न पाए
बदनाम नज़र
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