हमेशा से मिज़ाज-ए-हुस्न में दिक़्क़त-पसंदी है
मिरी दुश्वारियाँ आसान होना सख़्त मुश्किल है
अज़ीज़ लखनवी
हमेशा तिनके ही चुनते गुज़र गई अपनी
मगर चमन में कहीं आशियाँ बना न सके
अज़ीज़ लखनवी
हक़ारत से न देखो साकिनान-ए-ख़ाक की बस्ती
कि इक दुनिया है हर ज़र्रा इन अज्ज़ा-ए-परेशाँ का
अज़ीज़ लखनवी
हिज्र की रात काटने वाले
क्या करेगा अगर सहर न हुई
अज़ीज़ लखनवी
हुस्न-ए-आरास्ता क़ुदरत का अतिय्या है मगर
क्या मिरा इशक़-ए-जिगर-सोज़ ख़ुदा-दाद नहीं
अज़ीज़ लखनवी
इतना भी बार-ए-ख़ातिर-ए-गुलशन न हो कोई
टूटी वो शाख़ जिस पे मिरा आशियाना था
अज़ीज़ लखनवी
जब से ज़ुल्फ़ों का पड़ा है इस में अक्स
दिल मिरा टूटा हुआ आईना है
अज़ीज़ लखनवी

