मिरे दहन में अगर आप की ज़बाँ होती
तो फिर कुछ और ही उन्वान-ए-दास्ताँ होता
अज़ीज़ लखनवी
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मुझ को का'बा में भी हमेशा शैख़
याद-ए-अय्याम-ए-बुत-परस्ती थी
अज़ीज़ लखनवी
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मुसीबत थी हमारे ही लिए क्यूँ
ये माना हम जिए लेकिन जिए क्यूँ
अज़ीज़ लखनवी
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फूट निकला ज़हर सारे जिस्म में
जब कभी आँसू हमारे थम गए
अज़ीज़ लखनवी
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क़फ़स में जी नहीं लगता है आह फिर भी मिरा
ये जानता हूँ कि तिनका भी आशियाँ में नहीं
अज़ीज़ लखनवी
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क़त्ल और मुझ से सख़्त-जाँ का क़त्ल
तेग़ देखो ज़रा कमर देखो
अज़ीज़ लखनवी
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सबक़ आ के गोर-ए-ग़रीबाँ से ले लो
ख़मोशी मुदर्रिस है इस अंजुमन में
अज़ीज़ लखनवी
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