ज़रा सी बात पे क्या क्या फ़साना-साज़ी है
मैं ख़ुद भी चाहता कब था कि दास्ताँ न बने
असलम अंसारी
अपना मकान भी था उसी मोड़ पर मगर
जाने मैं किस ख़याल में औरों के घर गया
असलम आज़ाद
धूप के बादल बरस कर जा चुके थे और मैं
ओढ़ कर शबनम की चादर छत पे सोया रात भर
असलम आज़ाद
दोस्तों के साथ दिन में बैठ कर हँसता रहा
अपने कमरे में वो जा कर ख़ूब रोया रात भर
असलम आज़ाद
हमारे बीच वो चुप-चाप बैठा रहता है
मैं सोचता हूँ मगर कुछ मुझे पता न लगे
असलम आज़ाद
हज़ार बार निगाहों से चूम कर देखा
लबों पे उस के वो पहली सी अब मिठास नहीं
असलम आज़ाद
किसी तरह न तिलिस्म-ए-सुकूत टूट सका
वो दे रहा था बहुत दूर से सदा मुझ को
असलम आज़ाद

