EN اردو
2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

क्या कोई दिल लगा के कहे शे'र ऐ 'क़लक़'
नाक़द्री-ए-सुख़न से हैं अहल-ए-सुख़न उदास

अरशद अली ख़ान क़लक़




लाग़र ऐसा वहशत-ए-इश्क़-ए-लब-ए-शीरीं में हूँ
च्यूंटियाँ ले जानी हैं दाना मिरी ज़ंजीर का

अरशद अली ख़ान क़लक़




मय जो दी ग़ैर को साक़ी ने कराहत देखो
शीशा-ए-मय को मरज़ हो गया उबकाई का

अरशद अली ख़ान क़लक़




मैं वो मय-कश हूँ मिली है मुझ को घुट्टी में शराब
शीर के बदले पिया है मैं ने शीरा ताक का

अरशद अली ख़ान क़लक़




मंज़िल है अपनी अपनी 'क़लक़' अपनी अपनी गोर
कोई नहीं शरीक किसी के गुनाह में

अरशद अली ख़ान क़लक़




मिसाल-ए-आइना हम जब से हैरती हैं तिरे
कि जिन दिनों में न था तू सिंगार से वाक़िफ़

अरशद अली ख़ान क़लक़




मुबारक दैर-ओ-का'बा हों 'क़लक़' शैख़-ओ-बरहमन को
बिछाएँगे मुसल्ला चल के हम मेहराब-ए-अबरू में

अरशद अली ख़ान क़लक़