ख़त में लिक्खी है हक़ीक़त दश्त-गर्दी की अगर
नामा-बर जंगली कबूतर को बनाना चाहिए
अरशद अली ख़ान क़लक़
ख़ुदा-हाफ़िज़ है अब ऐ ज़ाहिदो इस्लाम-ए-आशिक़ का
बुतान-ए-दहर ग़ालिब आ गए हैं का'बा-ओ-दिल पर
अरशद अली ख़ान क़लक़
खुलने से एक जिस्म के सौ ऐब ढक गए
उर्याँ-तनी भी जोश-ए-जुनूँ में लिबास है
अरशद अली ख़ान क़लक़
ख़ुश-क़दों से कभी आलम न रहेगा ख़ाली
इस चमन से जो गया सर्व तो शमशाद आया
अरशद अली ख़ान क़लक़
कोताह उम्र हो गई और ये न कम हुई
ऐ जान आ के तूल-ए-शब-ए-इंतिज़ार देख
अरशद अली ख़ान क़लक़
कुछ ख़बर देता नहीं उस की दिल-ए-आगह मुझे
वही के मानिंद अब मौक़ूफ़ है इल्हाम का
अरशद अली ख़ान क़लक़
कुफ्र-ओ-इस्लाम के झगड़ों से छुड़ाया सद-शुक्र
क़ैद-ए-मज़हब से जुनूँ ने मुझे आज़ाद किया
अरशद अली ख़ान क़लक़

