मैं चीख़ता रहा कुछ और भी है मेरा इलाज
मगर ये लोग तुम्हारा ही नाम लेते रहे
अंजुम सलीमी
मैं दिल-ए-गिरफ़्ता तुझे गुनगुनाता रहता हूँ
बहुत दिनों से मिरे यार ज़ेर-ए-लब है तू
अंजुम सलीमी
मैं एक एक तमन्ना से पूछ बैठा हूँ
मुझे यक़ीं नहीं आता कि मेरा सब है तू
अंजुम सलीमी
मैं जिस चराग़ से बैठा था लौ लगाए हुए
पता चला वो अंधेरे में रख रहा था मुझे
अंजुम सलीमी
मैं ख़ुद से मिल के कभी साफ़ साफ़ कह दूँगा
मुझे पसंद नहीं है मुदाख़लत अपनी
अंजुम सलीमी
मैं सब का सब मोहब्बत के लिए हूँ
सो ला-महदूद मुद्दत के लिए हूँ
अंजुम सलीमी
मेरे चेहरे पे हैं आँखें मिरे सीने में है दिल
इस लिए तेरी हिफ़ाज़त नहीं कर सकता मैं
अंजुम सलीमी

