मेरी मिट्टी से बहुत ख़ुश हैं मिरे कूज़ा-गर
वैसा बन जाता हूँ मैं जैसा बनाते हैं मुझे
अंजुम सलीमी
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मिट के आसूदा हो गया हूँ मैं
ख़ाक में ख़ाक-ज़ाद मिल गया है
अंजुम सलीमी
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मुझ से ख़ाली है मेरा आईना
आँसुओं से भरा हुआ हूँ मैं
अंजुम सलीमी
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मुझे पता है कि बर्बाद हो चुका हूँ मैं
तू मेरा सोग मना मुझ को सोगवार न कर
अंजुम सलीमी
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पत्थर में कौन जोंक लगाएगा मेरे दोस्त
दिल है तो मुब्तला भी कहीं होना चाहिए
अंजुम सलीमी
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पुराना ज़हर नए नाम से मिला है मुझे
वो आस्तीन नहीं केंचुली बदल रहा था
अंजुम सलीमी
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रौशनी भी नहीं हवा भी नहीं
माँ का नेमुल-बदल ख़ुदा भी नहीं
अंजुम सलीमी

