मैं एक रोज़ उसे ढूँड कर तो ले आऊँ
वो अपनी ज़ात से बाहर कहीं मिले तो सही
सीमा ग़ज़ल
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मैं ने कहा था मुझ को अँधेरे का ख़ौफ़ है
उस ने ये सुन के आज मिरा घर जला दिया
सीमा ग़ज़ल
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मैं ने कहा था मुझ को अँधेरे का ख़ौफ़ है
उस ने ये सुन के आज मिरा घर जला दिया
सीमा ग़ज़ल
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मुझ को उस के नहीं ख़ुद मेरे हवाले करते
कम से कम ये तो मिरे चाहने वाले करते
सीमा ग़ज़ल
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सर्द होते हुए वजूद में बस
कुछ नहीं था अलाव आँखें थीं
सीमा ग़ज़ल
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सर्द होते हुए वजूद में बस
कुछ नहीं था अलाव आँखें थीं
सीमा ग़ज़ल
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अब वहाँ दामन-कशी की फ़िक्र दामन-गीर है
ये मिरे ख़्वाब-ए-मोहब्बत की नई ताबीर है
सीमाब अकबराबादी
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