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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

वो कौन है जो मिरे साथ साथ चलता है
ये देखने को कई बार रुक गया हूँ मैं

सलीम बेताब




बहुत क़रीब से कुछ भी न देख पाओगे
कि देखने के लिए फ़ासला ज़रूरी है

सलीम फ़ौज़




सुकूत बढ़ने लगा है सदा ज़रूरी है
कि जैसे हब्स में ताज़ा हवा ज़रूरी है

सलीम फ़ौज़




सुकूत बढ़ने लगा है सदा ज़रूरी है
कि जैसे हब्स में ताज़ा हवा ज़रूरी है

सलीम फ़ौज़




अँधेरे को निगलता जा रहा हूँ
दिया हूँ और जलता जा रहा हूँ

सलीम फ़िगार




कहीं आँखें कहीं बाज़ू कहीं से सर निकल आए
अँधेरा फैलते ही हर तरफ़ से डर निकल आए

सलीम फ़िगार




कहीं आँखें कहीं बाज़ू कहीं से सर निकल आए
अँधेरा फैलते ही हर तरफ़ से डर निकल आए

सलीम फ़िगार