रफ़्ता रफ़्ता घुल गई मेरी सोच की बर्फ़
यानी मैं ख़ुद हो गया अपने हाथों सर्फ़
सलीम अंसारी
सूरज डूबा और फिर उतरे काले साए
पेड़ों की आवाज़ पर पंछी वापस आए
सलीम अंसारी
यादों के सरमाए पर ख़ुद से माँगूँ ब्याज
यूँ अपनी तंहाई का जश्न मनाऊँ आज
सलीम अंसारी
यादों के सरमाए पर ख़ुद से माँगूँ ब्याज
यूँ अपनी तंहाई का जश्न मनाऊँ आज
सलीम अंसारी
मैं ने तो यूँही राख में फेरी थीं उँगलियाँ
देखा जो ग़ौर से तिरी तस्वीर बन गई
सलीम बेताब
उस मुल्क में भी लोग क़यामत के हैं मुंकिर
जिस मुल्क के हर शहर में इक हश्र बपा है
सलीम बेताब
उस मुल्क में भी लोग क़यामत के हैं मुंकिर
जिस मुल्क के हर शहर में इक हश्र बपा है
सलीम बेताब

