अब तक हमारी उम्र का बचपन नहीं गया
घर से चले थे जेब के पैसे गिरा दिए
नश्तर ख़ानक़ाही
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बिछड़ कर उस से सीखा है तसव्वुर को बदन करना
अकेले में उसे छूना अकेले में सुख़न करना
नश्तर ख़ानक़ाही
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मिरी क़ीमत को सुनते हैं तो गाहक लौट जाते हैं
बहुत कमयाब हो जो शय वो होती है गिराँ अक्सर
नश्तर ख़ानक़ाही
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पुर्सिश-ए-हाल से ग़म और न बढ़ जाए कहीं
हम ने इस डर से कभी हाल न पूछा अपना
नश्तर ख़ानक़ाही
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दीवार ख़स्ता-हाल है और दर उदास है
जब से कोई गया है मिरा घर उदास है
नासिर बशीर
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ता-अबद जिस का न साया जाए
पेड़ ऐसा भी लगाया जाए
नासिर बशीर
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हिचकियाँ रात दर्द तन्हाई
आ भी जाओ तसल्लियाँ दे दो
नासिर जौनपुरी

