पहले रग रग से मिरी ख़ून निचोड़ा उस ने
अब ये कहता है कि रंगत ही मिरी पीली है
मुज़फ़्फ़र वारसी
साँस लेता हूँ कि पत-झड़ सी लगी है मुझ में
वक़्त से टूट रहे हैं मिरे बँधन जैसे
मुज़फ़्फ़र वारसी
वा'दा मुआवज़े का न करता अगर ख़ुदा
ख़ैरात भी सख़ी से न मिलती फ़क़ीर को
मुज़फ़्फ़र वारसी
ज़ख़्म-ए-तन्हाई में ख़ुशबू-ए-हिना किस की थी
साया दीवार पे मेरा था सदा किस की थी
मुज़फ़्फ़र वारसी
ज़िंदगी तुझ से हर इक साँस पे समझौता करूँ
शौक़ जीने का है मुझ को मगर इतना भी नहीं
मुज़फ़्फ़र वारसी
बहुत क़रीब है 'मुज़्तर' वो ज़िंदगी का निज़ाम
नज़र न आएगा जब कोई बिस्मिल ओ क़ातिल
मुज़्तर हैदरी
हाए बे-चेहरगी ये इंसाँ की
हाए ये आदमी-नुमा क्या है
मुज़्तर हैदरी

