जिस दिन से अपना तर्ज़-ए-फ़क़ीराना छुट गया
शाही तो मिल गई दिल-ए-शाहाना छुट गया
मुस्तफ़ा ज़ैदी
ख़ुद अपने शब-ओ-रोज़ गुज़र जाएँगे लेकिन
शामिल है मिरे ग़म में तिरी दर-बदरी भी
मुस्तफ़ा ज़ैदी
मैं किस के हाथ पे अपना लहू तलाश करूँ
तमाम शहर ने पहने हुए हैं दस्ताने
मुस्तफ़ा ज़ैदी
मिरी रूह की हक़ीक़त मिरे आँसुओं से पूछो
मिरा मज्लिसी तबस्सुम मिरा तर्जुमाँ नहीं है
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नावक-ए-ज़ुल्म उठा दशना-ए-अंदोह सँभाल
लुत्फ़ के ख़ंजर-ए-बे-नाम से मत मार मुझे
मुस्तफ़ा ज़ैदी
रूह के इस वीराने में तेरी याद ही सब कुछ थी
आज तो वो भी यूँ गुज़री जैसे ग़रीबों का त्यौहार
मुस्तफ़ा ज़ैदी
तितलियाँ उड़ती हैं और उन को पकड़ने वाले
सई-ए-नाकाम में अपनों से बिछड़ जाते हैं
मुस्तफ़ा ज़ैदी

