ख़ौफ़ इक बुलंदी से पस्तियों में रुलने का
आब-जू में रहता है और नज़र नहीं आता
मुस्तफ़ा शहाब
मैं और मेरा शौक़-ए-सफ़र साथ हैं मगर
ये और बात है कि सफ़र हो गए तमाम
मुस्तफ़ा शहाब
मैं भी शायद आप को तन्हा मिलों
अपनी तन्हाई में जा कर देखिए
मुस्तफ़ा शहाब
मैं सच से गुरेज़ाँ हूँ और झूट पे नादिम हूँ
वो सच पे पशेमाँ है और झूट पर आमादा
मुस्तफ़ा शहाब
शायद वो भूली-बिसरी न हो आरज़ू कोई
कुछ और भी कमी सी है तेरी कमी के साथ
मुस्तफ़ा शहाब
सुब्ह तक जाने कहाँ मुझ को उड़ा कर ले जाए
एक आँधी जो सर-ए-शाम चली है मुझ में
मुस्तफ़ा शहाब
ज़ेहन में याद के घर टूटने लगते हैं 'शहाब'
लोग हो जाते हैं जी जी के पुराने कितने
मुस्तफ़ा शहाब

