मसअले तो ज़िंदगी में रोज़ आते हैं मगर
ज़िंदगी के मसअलों का हल निकलना चाहिए
मोहम्मद अली साहिल
मेरी आँखों में हुए रौशन जो अश्कों के चराग़
उन के होंटों पर तबस्सुम का दिया जलता रहा
मोहम्मद अली साहिल
मेरी नींदें हराम क्या होंगी
घर में रिज़्क़-ए-हलाल आता है
मोहम्मद अली साहिल
सब के होंटों पे वारदात के बअ'द
सिर्फ़ मेरा ही नाम होता है
मोहम्मद अली साहिल
वो यक़ीनन वली सिफ़त होगा
ख़ैर से जो भी शर में रहता है
मोहम्मद अली साहिल
आँख पड़ती है कहीं पाँव कहीं पड़ता है
सब की है तुम को ख़बर अपनी ख़बर कुछ भी नहीं
मोहम्मद अली तिशना
अंधेरा है कैसे तिरा ख़त पढ़ूँ
लिफ़ाफ़े में कुछ रौशनी भेज दे
मोहम्मद अल्वी

