चलो लहू भी चराग़ों की नज़्र कर देंगे
ये शर्त है कि वो फिर रौशनी ज़ियादा करें
मंज़ूर हाशमी
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चीख़-ओ-पुकार में तो हैं शामिल तमाम लोग
क्या बात है ये कोई बता भी नहीं रहा
मंज़ूर हाशमी
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फ़िराक़ बिछड़ी हुई ख़ुशबुओं का सह न सकें
तो फूल अपना बदन पारा पारा करते हैं
मंज़ूर हाशमी
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हदफ़ भी मुझ को बनाना है और मेरे हरीफ़
मुझी से तीर मुझी से कमान माँगते हैं
मंज़ूर हाशमी
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हमारे लफ़्ज़ आइंदा ज़मानों से इबारत हैं
पढ़ा जाएगा कल जो आज वो तहरीर करते हैं
मंज़ूर हाशमी
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हमारे साथ भी चलता है रस्ता
हमारे बा'द भी रस्ता चलेगा
मंज़ूर हाशमी
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इक ज़माना है हवाओं की तरफ़
मैं चराग़ों की तरफ़ हो जाऊँ
मंज़ूर हाशमी
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