ज़िंदगी शायद इसी का नाम है
दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ
कैफ़ भोपाली
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तुझे क्या बताऊँ मैं बे-ख़बर कि है दर्द-ए-इश्क़ में क्या असर
ये है वो लतीफ़ सी कैफ़ियत जो ज़बाँ तक आए अदा न हो
कैफ़ इक्रामी
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अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ
वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईं
कैफ़ी आज़मी
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बहार आए तो मेरा सलाम कह देना
मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने
कैफ़ी आज़मी
बस इक झिजक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में
कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में
कैफ़ी आज़मी
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बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए
इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए
कैफ़ी आज़मी
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बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें
मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले
कैफ़ी आज़मी
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