मिलते हैं इस अदा से कि गोया ख़फ़ा नहीं
क्या आप की निगाह से हम आश्ना नहीं
हसरत मोहानी
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मुझ को देखो मिरे मरने की तमन्ना देखो
फिर भी है तुम को मसीहाई का दा'वा देखो
हसरत मोहानी
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मुझ से तन्हाई में गर मिलिए तो दीजे गालियाँ
और बज़्म-ए-ग़ैर में जान-ए-हया हो जाइए
हसरत मोहानी
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मुनहसिर वक़्त-ए-मुक़र्रर पे मुलाक़ात हुई
आज ये आप की जानिब से नई बात हुई
हसरत मोहानी
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नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं
हसरत मोहानी
पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ था
हर नग़्मा-ए-कृष्ण बाँसुरी का
हसरत मोहानी
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पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ था
हर नग़्मा-ए-कृष्ण बाँसुरी का
हसरत मोहानी
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