कोई मौसम हो यही सोच के जी लेते हैं
इक न इक रोज़ शजर ग़म का हरा तो होगा
हसन नईम
कुछ उसूलों का नशा था कुछ मुक़द्दस ख़्वाब थे
हर ज़माने में शहादत के यही अस्बाब थे
हसन नईम
क्या फ़िराक़ ओ फ़ैज़ से लेना था मुझ को ऐ 'नईम'
मेरे आगे फ़िक्र-ओ-फ़न के कुछ नए आदाब थे
हसन नईम
मैं अपनी रूह में उस को बसा चुका इतना
अब उस का हुस्न भी पर्दा दिखाई देता है
हसन नईम
मैं एक बाब था अफ़साना-ए-वफ़ा का मगर
तुम्हारी बज़्म से उट्ठा तो इक किताब बना
हसन नईम
मौजा-ए-अश्क से भीगी न कभी नोक-ए-क़लम
वो अना थी कि कभी दर्द न जी का लिक्खा
हसन नईम
पाँव से लग के खड़ी है ये ग़रीब-उल-वतनी
उस को समझाओ कि हम अपने वतन आए हैं
हसन नईम

