'हसन-जमील' तिरा घर अगर ज़मीन पे है
तो फिर ये किस लिए गुम आसमान में तू है
हसन जमील
कितनी बे-रंग थी दुनिया मिरे ख़्वाबों की 'जमील'
उस को देखा है तो आँखों में उजाला हुआ है
हसन जमील
मालूम हुआ कैसे ख़िज़ाँ आती है गुल पर
सीखा है बिखरना तिरे इंकार से मैं ने
हसन जमील
ये रौशनी यूँही आग़ोश में नहीं आती
चराग़ बन के मुंडेरों पे जलना पड़ता है
हसन जमील
ज़िंदगी भर दर-ओ-दीवार सजाए जाएँ
तब कहीं जा के मकीनों पे मकाँ खुलते हैं
हसन जमील
हम को इस की क्या ख़बर गुलशन का गुलशन जल गया
हम तो अपना सिर्फ़ अपना आशियाँ देखा किए
हसन नज्मी सिकन्दरपुरी
माँगो समुंदरों से न साहिल की भीक तुम
हाँ फ़िक्र ओ फ़न के वास्ते गहराई माँग लो
हसन नज्मी सिकन्दरपुरी

