लाख कहते रहें ज़ुल्मत को न ज़ुल्मत लिखना
हम ने सीखा नहीं प्यारे ब-इजाज़त लिखना
हबीब जालिब
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लोग डरते हैं दुश्मनी से तिरी
हम तिरी दोस्ती से डरते हैं
हबीब जालिब
न तेरी याद न दुनिया का ग़म न अपना ख़याल
अजीब सूरत-ए-हालात हो गई प्यारे
हबीब जालिब
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पा सकेंगे न उम्र भर जिस को
जुस्तुजू आज भी उसी की है
हबीब जालिब
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तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था
हबीब जालिब
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तुम्हें तो नाज़ बहुत दोस्तों पे था 'जालिब'
अलग-थलग से हो क्या बात हो गई प्यारे
हबीब जालिब
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तू आग में ऐ औरत ज़िंदा भी जली बरसों
साँचे में हर इक ग़म के चुप-चाप ढली बरसों
हबीब जालिब
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