कितने सनम ख़ुद हम ने तराशे
ज़ौक़-ए-परस्तिश अल्लाहु-अकबर
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
मौत के ब'अद भी मरने पे न राज़ी होना
यही एहसास तो सरमाया-ए-दीं होता है
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
मेरे लिए जीने का सहारा है अभी तक
वो अहद-ए-तमन्ना कि तुम्हें याद न होगा
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
मुझ को एहसास-ए-रंग-ओ-बू न हुआ
यूँ भी अक्सर बहार आई है
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
न हो कुछ और तो वो दिल अता हो
बहल जाए जो सई-ए-राएगाँ से
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
निगाह-ए-लुत्फ़ को उल्फ़त-शिआर समझे थे
ज़रा से ख़ंदा-ए-गुल को बहार समझते थे
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
रानाई-ए-बहार पे थे सब फ़रेफ़्ता
अफ़सोस कोई महरम-ए-राज़-ए-ख़िज़ाँ न था
हबीब अहमद सिद्दीक़ी

