क्या नहीं जानता मुझे कोई
क्या नहीं शहर में वो घर बाक़ी
सलमान अख़्तर
कुछ तो मैं भी डरा डरा सा था
और कुछ रास्ता नया सा था
सलमान अख़्तर
कुछ तो अपने लिए भी रखना है
ज़ख़्म औरों को क्यूँ दिखाएँ सब
सलमान अख़्तर
कोई शय एक सी नहीं रहती
उम्र ढलती है ग़म बदलते हैं
सलमान अख़्तर
ख़ाली बरामदों ने मुझे देख कर कहा
क्या बात है उदास से कुछ लग रहे हो तुम
सलमान अख़्तर
ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत न हो मगर
पहले सा जोश पहले सी शिद्दत नहीं रही
सलमान अख़्तर
जिस से सारे चराग़ जलते थे
वो चराग़ आज कुछ बुझा सा था
सलमान अख़्तर
झूटी उम्मीद की उँगली को पकड़ना छोड़ो
दर्द से बात करो दर्द से लड़ना छोड़ो
सलमान अख़्तर
झाँकते रात के गरेबाँ से
हम ने सौ आफ़्ताब देखे हैं
सलमान अख़्तर

