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महबूब ख़िज़ां शायरी | शाही शायरी

महबूब ख़िज़ां शेर

26 शेर

तुम्हारे वास्ते सब कुछ है मेरे बंदा-नवाज़
मगर ये शर्त कि पहले पसंद आओ मुझे

महबूब ख़िज़ां




पलट गईं जो निगाहें उन्हीं से शिकवा था
सो आज भी है मगर देर हो गई शायद

महबूब ख़िज़ां




मिरी निगाह में कुछ और ढूँडने वाले
तिरी निगाह में कुछ और ढूँडता हूँ मैं

महबूब ख़िज़ां




कोई रस्ता कहीं जाए तो जानें
बदलने के लिए रस्ते बहुत हैं

महबूब ख़िज़ां




अब याद कभी आए तो आईने से पूछो
'महबूब-ख़िज़ाँ' शाम को घर क्यूँ नहीं जाते

महबूब ख़िज़ां




'ख़िज़ाँ' कभी तो कहो एक इस तरह की ग़ज़ल
कि जैसे राह में बच्चे ख़ुशी से खेलते हैं

महबूब ख़िज़ां




कतराते हैं बल खाते हैं घबराते हैं क्यूँ लोग
सर्दी है तो पानी में उतर क्यूँ नहीं जाते

महबूब ख़िज़ां




कतराते हैं बल खाते हैं घबराते हैं क्यूँ लोग
सर्दी है तो पानी में उतर क्यूँ नहीं जाते

महबूब ख़िज़ां




हवा चली तो फिर आँखों में आ गए सब रंग
मगर वो सात बरस लौट कर नहीं आए

महबूब ख़िज़ां