EN اردو
हसन अब्बास रज़ा शायरी | शाही शायरी

हसन अब्बास रज़ा शेर

19 शेर

मैं तर्क-ए-तअल्लुक़ पे भी आमादा हूँ लेकिन
तू भी तो मिरा क़र्ज़-ए-ग़म-ए-हिज्र अदा कर

हसन अब्बास रज़ा




ये कार-ए-इश्क़ तो बच्चों का खेल ठहरा है
सो कार-ए-इश्क़ में कोई कमाल क्या करना

हसन अब्बास रज़ा




उस का फ़िराक़ इतना बड़ा सानेहा न था
लेकिन ये दुख पहाड़ बराबर लगा हमें

हसन अब्बास रज़ा




तुझ से बिछड़ के सम्त-ए-सफ़र भूलने लगे
फिर यूँ हुआ हम अपना ही घर भूलने लगे

हसन अब्बास रज़ा




तअल्लुक़ तोड़ने में पहल मुश्किल मरहला था
चलो हम ने तुम्हारा बोझ हल्का कर दिया है

हसन अब्बास रज़ा




सिवा तेरे हर इक शय को हटा देना है मंज़र से
और इस के ब'अद ख़ुद को बे-सर-ओ-सामान करना है

हसन अब्बास रज़ा




शाम-ए-विदाअ थी मगर उस रंग-बाज़ ने
पाँव पे होंट रख दिए जाने नहीं दिया

हसन अब्बास रज़ा




सवाल ये नहीं मुझ से है क्यूँ गुरेज़ाँ वो
सवाल ये है कि क्यूँ जिस्म ओ जाँ से बाहर है

हसन अब्बास रज़ा




मोहब्बतें तो फ़क़त इंतिहाएँ माँगती हैं
मोहब्बतों में भला ए'तिदाल क्या करना

हसन अब्बास रज़ा