ज़िंदगी देख ले कुछ देर तमाशा अपना
टूटता जाता है आवाज़ से रिश्ता अपना
दो-घड़ी को भी किसी ने मुझे कांधा न दिया
उम्र-भर ढोता रहा ख़ुद ही जनाज़ा अपना
नस्ब हर शख़्स नज़र आता है चौराहे पर
आदमी भूल गया भीड़ में रस्ता अपना
कितनी सदियों से हूँ अंजान सफ़र में 'सैफ़ी'
आज तक मैं ने तो घर भी नहीं देखा अपना
ग़ज़ल
ज़िंदगी देख ले कुछ देर तमाशा अपना
मुनीर सैफ़ी

