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ज़िंदगी देख ले कुछ देर तमाशा अपना | शाही शायरी
zindagi dekh le kuchh der tamasha apna

ग़ज़ल

ज़िंदगी देख ले कुछ देर तमाशा अपना

मुनीर सैफ़ी

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ज़िंदगी देख ले कुछ देर तमाशा अपना
टूटता जाता है आवाज़ से रिश्ता अपना

दो-घड़ी को भी किसी ने मुझे कांधा न दिया
उम्र-भर ढोता रहा ख़ुद ही जनाज़ा अपना

नस्ब हर शख़्स नज़र आता है चौराहे पर
आदमी भूल गया भीड़ में रस्ता अपना

कितनी सदियों से हूँ अंजान सफ़र में 'सैफ़ी'
आज तक मैं ने तो घर भी नहीं देखा अपना