ज़मीर-ए-ख़ाक शह-ए-दो-सरा में रौशन है
मिरा ख़ुदा मिरे हर्फ़-ए-दुआ में रौशन है
वो आँधियाँ थीं कि मैं कब का बुझ गया होता
चराग़-ए-ज़ात भी हम्द-ओ-सना में रौशन है
मैं अपनी माँ के वसीले से ज़िंदा-तर ठहरूँ
कि वो लहू मिरे सब्र-ओ-रज़ा में रौशन है
मैं बढ़ रहा हूँ उधर या वो आ रहा है इधर
वही ख़ुशी वही ख़ुश्बू हवा में रौशन है
कहीं भी जाऊँ सितारा सा साथ रहता है
वो शब-चराग़ जो उस की हवा में रौशन है
ग़ज़ल
ज़मीर-ए-ख़ाक शह-ए-दो-सरा में रौशन है
अबुल हसनात हक़्क़ी

