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ज़मीं से उगती है या आसमाँ से आती है | शाही शायरी
zamin se ugti hai ya aasman se aati hai

ग़ज़ल

ज़मीं से उगती है या आसमाँ से आती है

अहमद मुश्ताक़

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ज़मीं से उगती है या आसमाँ से आती है
ये बे-इरादा उदासी कहाँ से आती है

इसे नए दर-ओ-दीवार भी न रोक सके
वो इक सदा जो पुराने मकाँ से आती है

बदन की बॉस नसीम-ए-लिबास बू-ए-नफ़स
कोई महक हो उसी ख़ाक-दाँ से आती है

दिलों की बर्फ़ पिघलती नहीं है जिस के बग़ैर
वो आँच एक ग़म-ए-बे-निशाँ से आती है

सुख़न-वरी है नज़र से नज़र का नाज़-ओ-नियाज़
अरूज़ से न ज़बान-ओ-बयाँ से आती है