ज़मीन को फूल फ़ज़ा को घटाएँ देता है
मुझे फ़लक से वो अब तक सदाएँ देता है
वही नवा-गर-ए-आलम ख़ुदा-ए-सौत-ओ-सदा
वही हवा को फ़क़त साएँ साएँ देता है
वही कहीं गुल-ए-नग़्मा कहीं गुल-ए-नौहा
वही ग़मों को सरों की क़बाएँ देता है
वो कोह-सार-ए-तहय्युर वो आब-शार-ए-निदा
ख़मोशियों को भी क्या क्या निदाएँ देता है
कोई तो रोए लिपट कर जवान लाशों से
इसी लिए तो वो बेटों को माएँ देता है
ग़ज़ल
ज़मीन को फूल फ़ज़ा को घटाएँ देता है
ख़ालिद अहमद

