ज़ख़्म खुले पड़ते हैं दिल के मौसम है ये बहारों का
लाला-ओ-गुल की बात निकालो ज़िक्र करो अँगारों का
हम दुखियारे उन के सहारे चार-क़दम ही चल लेंगे
चाँद का आख़िर हम क्या लेंगे क्या बिगड़ेगा तारों का
एक तबस्सुम इक निगह ख़ामोश तकल्लुम वो भी नहीं
क्या होगा जीने का सहारा हम से दिल-अफ़गारों का
हम तो ठहरे ग़म के मारे जीने को जी ही लेंगे
क्या होगा दर-चश्म-ए-सुबू-बर-दोश चमन-बर्दारों का
दिल है लज़्ज़त-ए-ग़म का ख़ूगर सुनते ही चौंक उठता है
ज़िक्र कोई जब छिड़ जाता है उन नाज़ुक तलवारों का
जश्न-ए-तरब के उनवाँ कितने फैले कितने आम हुए
तुम ही कहो कुछ अपनी बीती क़िस्सा दर्द के मारों का
तूफ़ानी है ग़म की कहानी फिर वो कहाँ मौज़ू-ए-ग़ज़ल
बात बनातुन्ना'श की छेड़ो ज़िक्र करो मह-पारों का

ग़ज़ल
ज़ख़्म खुले पड़ते हैं दिल के मौसम है ये बहारों का
सज्जाद बाक़र रिज़वी