ज़हर के तीर मिरे चारों तरफ़ खींचता है
क्या अजब शख़्स है अपनों पे हदफ़ खींचता है
फिर वही दिल में उदासी के उमडते बादल
फिर वही सिलसिला-ए-ख़ाक-ओ-ख़ज़फ़ खींचता है
फिर वही क़हर वही फ़ित्ना-ए-दज्जाल के दिन
फिर वही क़िस्सा-ए-अस्हाब-ए-कहफ़ खींचता है
कौन सी सोई हुई प्यास का रिश्ता जागा
आज क्यूँ मुझ को ये सहरा-ए-नजफ़ खींचता है
कौन से लोग थे ज़ुल्मात के सहराओं में
कि जिन्हें मर्तबा-ए-इज़-ओ-शरफ़ खींचता है
ग़ज़ल
ज़हर के तीर मिरे चारों तरफ़ खींचता है
क़मर सिद्दीक़ी

