ज़ाब्तों की और क़द्रों की रवानी देखना
फिर हवा में चार-सू इक बद-गुमानी देखना
लम्हा लम्हा फैलता ही जा रहा है चार-सू
शहर में जंगल की इक दिन बे-करानी देखना
चाहता है वो मुझे ख़ुश देखना हर हाल में
छीन लेगा मुझ से मेरी नौहा-ख़्वानी देखना
आने वाली और अभी रातें हैं तारीक-ओ-मुहीब
और उतरेंगी बलाएँ आसमानी देखना
धूप निकलेगी तो बह निकलेंगे फिर से आबशार
बर्फ़ दोहराएगी फिर अपनी कहानी देखना
अपना घर हम ने बसाया है लब-ए-दरिया तो फिर
बाम-ओ-दर तक आएगा इक रोज़ पानी देखना
आएँगे 'बेताब' मौसम फिर चनारों पर नए
लाएँगे रंगों की इक ताज़ा कहानी देखना
ग़ज़ल
ज़ाब्तों की और क़द्रों की रवानी देखना
प्रीतपाल सिंह बेताब

