यूरिश-ए-आलाम है लेकिन मिरा दिल एक है
सैंकड़ों मौजों की ज़द में आज साहिल एक है
यूँ तो हैं लाखों हसीं उल्फ़त के क़ाबिल एक है
चार-जानिब हैं शुआएँ माह-ए-कामिल एक है
आह-ए-सोज़ाँ नाला-ए-शब-गीर या ज़ब्त-ओ-सुकूँ
बद-नसीबों के लिए इन सब का हासिल एक है
क़ैस हो फ़रहाद हो वामिक़ हो या महमूद हो
हैं निगाहें मुख़्तलिफ़ लैला-ए-महमिल एक है
दामन-ए-हर-मौज ही अपना तो साहिल है 'अज़ीज़'
कौन कहता है कि बहर-ए-ग़म में साहिल एक है
ग़ज़ल
यूरिश-ए-आलाम है लेकिन मिरा दिल एक है
अज़ीज़ वारसी

