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यूँही कर लेते हैं औक़ात बसर अपना क्या | शाही शायरी
yunhi kar lete hain auqat basar apna kya

ग़ज़ल

यूँही कर लेते हैं औक़ात बसर अपना क्या

फ़ारूक़ नाज़की

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यूँही कर लेते हैं औक़ात बसर अपना क्या
अपने ही शहर में हैं शहर-बदर अपना क्या

रात लम्बी है चलो ग़ीबत-ए-याराँ कर लें
शब किसी तौर तो हो जाए बसर अपना क्या

दूरियाँ फ़ासले दुश्वार गुज़रगाहें हैं
है यही शर्त-ए-सफ़र रख़्त-ए-सफ़र अपना क्या

तुझ से अब इज़्न-ए-तकल्लुम भी अगर मिल जाए
लब हिलें या न हिलें आँख हो तर अपना क्या

जाम फिर ताज़ा करो रात बहुत लम्बी है
कुछ तो करना है मियाँ ता-ब-सहर अपना क्या