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ये ज़िंदा रहने का मौसम गुज़र न जाए कहीं | शाही शायरी
ye zinda rahne ka mausam guzar na jae kahin

ग़ज़ल

ये ज़िंदा रहने का मौसम गुज़र न जाए कहीं

असअ'द बदायुनी

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ये ज़िंदा रहने का मौसम गुज़र न जाए कहीं
अब आ भी जाओ दिल-ए-ज़ार मर न जाए कहीं

मिरा सितारा तो अब तक नज़र नहीं आया
मैं डर रहा हूँ कि ये शब गुज़र न जाए कहीं

नदी किनारे खड़ा पेड़ सोच में गुम है
कोई भँवर उसे बर्बाद कर न जाए कहीं

परिंदे अपने ठिकानों को ख़ैर से पहुँचे
दुआ यही है कि कोई ठहर न जाए कहीं

गिला भी ख़ुद से है और सिलसिला भी ख़ुद से है
हमारी बात इधर से उधर न जाए कहीं