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ये उजाला हर इक शय को चमका गया | शाही शायरी
ye ujala har ek shai ko chamka gaya

ग़ज़ल

ये उजाला हर इक शय को चमका गया

मुश्ताक़ नक़वी

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ये उजाला हर इक शय को चमका गया
आइना दिल का कुछ और धुँदला गया

आज मग़्मूम है वो सर-ए-आईना
ज़ुल्फ़ उलझी तो मेरा ख़याल आ गया

अपनी बर्बादियों का मुझे ग़म नहीं
ग़म ये है किस तरह तुझ से देखा गया

इतनी फ़ुर्सत कहाँ थी कि हम सोचते
इश्क़ में क्या हुआ, क्या मिला, क्या गया

लुट गया जोहद-ए-हस्ती में एहसास भी
ज़िंदगी के लिए हाए क्या क्या गया

जिस के होंटों के दामन में कुछ भी न था
जब उठा बज़्म से गीत बरसा गया