ये तेरा इश्क़ कब का आश्ना था
कहाँ का जान को मेरी धरा था
वो साअत कौन सी थी या इलाही
कि जिस साअत दो-चार उस से हुआ था
मैं काश उस वक़्त आँखें मूँद लेता
कि मेरा देखना मुझ पर बला था
मैं अपने हाथ अपने दिल को खोया
ख़ुदावंदा मैं क्यूँ आशिक़ हुआ था
न था उस वक़्त जुज़ अल्लाह कोई
वले ये 'सोज़' पहलू में खड़ा था
ग़ज़ल
ये तेरा इश्क़ कब का आश्ना था
मीर सोज़

