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ये सुख़न जो मेरी ज़बाँ पे है ये सुख़न है उस का कहा हुआ | शाही शायरी
ye suKHan jo meri zaban pe hai ye suKHan hai us ka kaha hua

ग़ज़ल

ये सुख़न जो मेरी ज़बाँ पे है ये सुख़न है उस का कहा हुआ

मोहसिन ज़ैदी

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ये सुख़न जो मेरी ज़बाँ पे है ये सुख़न है उस का कहा हुआ
ये बयाँ जो है मिरे नाम से ये बयाँ है उस का लिखा हुआ

वही मैली मैली सी चाँदनी वही धुँदली धुँदली सी रौशनी
ये चराग़ कोई चराग़ है न जला हुआ न बुझा हुआ

वही एक याद किरन किरन मिरी ज़िंदगी में है ज़ौ-फ़गन
वही एक चेहरा चमन चमन सर-ए-दश्त-ए-जाँ है खिला हुआ

सर-ए-राह कुछ न पता चला वो कहाँ गया वो किधर गया
कहीं नक़्श-ए-पा था बना हुआ कहीं नक़्श-ए-पा था मिटा हुआ

करूँ दोस्तों को मैं नज़्र क्या मिरे पास दाम-ओ-दिरम कहाँ
वो जो दुश्मनों का हिसाब था वो तो नक़्द-ए-जाँ से अदा हुआ

न किसी की याद का नक़्श है न किसी के रुख़ का ये अक्स है
ये न कोई हर्फ़ न लफ़्ज़ है सर-ए-ख़ाक क्या है लिखा हुआ

मुझे 'मोहसिन' इस का गिला नहीं मुझे माल-ओ-ज़र जो मिला नहीं
जो हुनर सुख़न का मुझे मिला वो कहाँ सभी को अता हुआ