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यार रूठा है हम सें मनता नहिं | शाही शायरी
yar ruTha hai hum sen manta nahin

ग़ज़ल

यार रूठा है हम सें मनता नहिं

आबरू शाह मुबारक

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यार रूठा है हम सें मनता नहिं
दिल की गर्मी सीं कुछ ओ पहनता नहिं

तुझ को गहना पहना के मैं देखूँ
हैफ़ है ये बनाव बनता नहिं

जिन नें उस नौ-जवान को बरता
वो किसी और को बरतता नहिं

कोफ़्त चेहरे पे शब की ज़ाहिर है
क्यूँ-के कहिए कि कुछ वचंता नहिं

शौक़ नहिं मुझ कूँ कुछ मशीख़त का
जाल मकड़ी की तरह तनता नहिं

तेरे तन का ख़मीर और ही है
आब ओ गिल इस सफ़ा सीं सनता नहिं

जियो दुनिया भी काम है लेकिन
'आबरू' बिन कोई करंता नहिं