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वो ख़ाली हाथ सफ़र-ए-आब पर रवाना हुआ | शाही शायरी
wo Khaali hath safar-e-ab par rawana hua

ग़ज़ल

वो ख़ाली हाथ सफ़र-ए-आब पर रवाना हुआ

फ़र्रुख़ जाफ़री

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वो ख़ाली हाथ सफ़र-ए-आब पर रवाना हुआ
ख़बर न थी कि समुंदर तही-ख़ज़ाना हुआ

बिछड़ते वक़्त था दिल में ग़ुबार उस से मगर
सुख़न ही तल्ख़ न लहजा शिकायताना हुआ

हवा भी तेज़ न थी मो'तदिल था मौसम भी
ज़मीन पाँव के नीचे थी इक ज़माना हुआ