वो कहते हैं यक़ीं लाना पड़ेगा
ये धोका जान कर खाना पड़ेगा
ज़माने को बदलना हम ने ठाना
ज़माने को बदल जाना पड़ेगा
सलामत है हमारा जज़्ब-ए-उल्फ़त
तुम आओगे तुम्हें आना पड़ेगा
यही मर्ज़ी है उस आराम-ए-जाँ की
हमें अब जान से जाना पड़ेगा
दिल-ए-नादाँ समझ जाएगा लेकिन
दिल-ए-नादाँ को समझाना पड़ेगा
अदू के नाज़ उठते कौन देखे
तिरी महफ़िल में उठ जाना पड़ेगा
नहीं ऐ संग-ए-दिल हाँ वो नहीं तू
किए पर जिस को पछताना पड़ेगा
बड़ा बद-राह है चर्ख़-ए-सितमगर
उसे अब राह पर लाना पड़ेगा
पड़ा है ऐ 'वफ़ा' पाला बुतों से
ख़ुदा को दरमियाँ लाना पड़ेगा
ग़ज़ल
वो कहते हैं यक़ीं लाना पड़ेगा
मेला राम वफ़ा

