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वो कहते हैं यक़ीं लाना पड़ेगा | शाही शायरी
wo kahte hain yaqin lana paDega

ग़ज़ल

वो कहते हैं यक़ीं लाना पड़ेगा

मेला राम वफ़ा

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वो कहते हैं यक़ीं लाना पड़ेगा
ये धोका जान कर खाना पड़ेगा

ज़माने को बदलना हम ने ठाना
ज़माने को बदल जाना पड़ेगा

सलामत है हमारा जज़्ब-ए-उल्फ़त
तुम आओगे तुम्हें आना पड़ेगा

यही मर्ज़ी है उस आराम-ए-जाँ की
हमें अब जान से जाना पड़ेगा

दिल-ए-नादाँ समझ जाएगा लेकिन
दिल-ए-नादाँ को समझाना पड़ेगा

अदू के नाज़ उठते कौन देखे
तिरी महफ़िल में उठ जाना पड़ेगा

नहीं ऐ संग-ए-दिल हाँ वो नहीं तू
किए पर जिस को पछताना पड़ेगा

बड़ा बद-राह है चर्ख़-ए-सितमगर
उसे अब राह पर लाना पड़ेगा

पड़ा है ऐ 'वफ़ा' पाला बुतों से
ख़ुदा को दरमियाँ लाना पड़ेगा