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वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें | शाही शायरी
waqt-e-piri shabab ki baaten

ग़ज़ल

वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

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वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें
ऐसी हैं जैसे ख़्वाब की बातें

in old age talk of youth now seems
to be just like the stuff of dreams

फिर मुझे ले चला उधर देखो
दिल-ए-ख़ाना-ख़राब की बातें

Lo! there again it takes me see!
my ruined heart's advice to me

वाइज़ा छोड़ ज़िक्र-ए-नेमत-ए-ख़ुल्द
कह शराब-ओ-कबाब की बातें

on heaven's virtues don't opine
O preacher talk of food and wine

मह-जबीं याद हैं कि भूल गए
वो शब-ए-माहताब की बातें

do you recall O moon faced one
on moonlit nights what we had done

हर्फ़ आया जो आबरू पे मिरी
हैं ये चश्म-ए-पुर-आब की बातें

if, blemish on my honor, came
my teary eyes are then to blame

सुनते हैं उस को छेड़ छेड़ के हम
किस मज़े से इताब की बातें

I tease her for I love to hear
her anger's music to my ear

जाम-ए-मय मुँह से तू लगा अपने
छोड़ शर्म ओ हिजाब की बातें

do let your lips in wine immerse
let shame and modesty,disperse

मुझ को रुस्वा करेंगी ख़ूब ऐ दिल
ये तिरी इज़्तिराब की बातें

disgraced, O heart you now shall be
because of your anxiety

जाओ होता है और भी ख़फ़क़ाँ
सुन के नासेह जनाब की बातें

go, angrier now let him be
when the preacher talks to me

क़िस्सा-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार दिल के लिए
हैं अजब पेच-ओ-ताब की बातें

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ज़िक्र क्या जोश-ए-इश्क़ में ऐ 'ज़ौक़'
हम से हों सब्र ओ ताब की बातें

in love's ardour, zauq, how, pray
can I speak of restraint today?