उन को मैं ने अपना कहा है
इतनी ही बस अपनी ख़ता है
राही हैराँ देख रहा है
रहज़न ही अब राह-नुमा है
ये दिल उन से जब से लगा है
उन के सिवा सब भूल गया है
उस जीने से बाज़ हम आए
जीना क्या है एक सज़ा है
लब खुलते ही फूल हैं झड़ते
कितनी प्यारी उन की अदा है
ग़ज़ल
उन को मैं ने अपना कहा है
आसी रामनगरी

