उजाला जब शब-ए-ज़ुल्मात पर उतरता है
वो हर्फ़ हर्फ़ मिरी ज़ात पर उतरता है
उस एक रंग पे क़ुर्बान दिल के सब मौसम
जो रंग शिद्दत-ए-जज़्बात पर उतरता है
वो ख़्वाब-गाह की रौनक़ वो चाँद जैसा बदन
कभी हयात कभी ज़ात पर उतरता है
सुख़न-वरान-ए-कुहन उस पे रश्क करते हैं
जो दर्द पर्चा-ए-अबयात पर उतरता है
कभी-कभार तो सुक़रात की रिदा बन कर
शऊर-ए-फ़िक्र तिलिस्मात पर उतरता है
ग़ज़ल
उजाला जब शब-ए-ज़ुल्मात पर उतरता है
अज़्म शाकरी

