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टूटी हुई दीवार का साया तो नहीं हूँ | शाही शायरी
TuTi hui diwar ka saya to nahin hun

ग़ज़ल

टूटी हुई दीवार का साया तो नहीं हूँ

मज़हर इमाम

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टूटी हुई दीवार का साया तो नहीं हूँ
मैं तेरा ही भूला हुआ वादा तो नहीं हूँ

गुज़रा था दबे पाँव जहाँ से तू शब-ए-माह
मैं ही वो तिरा बाग़-ए-तमन्ना तो नहीं हूँ

जिस नक़्श पे चलने की क़सम खाती है दुनिया
मैं ही वो तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा तो नहीं हूँ

औरों से मिरा नाम उलझता है तो उलझे
शिकवा तुझे क्यूँ हो कि मैं तेरा तो नहीं हूँ

क्यूँ ख़ुद को न चाहूँ कि तिरा दिल तो नहीं मैं
क्यूँ ख़ुद को भुला दूँ कि ज़माना तो नहीं हूँ

तू मेरी ज़रूरत मिरी आदत तो नहीं है
महताब-ए-ज़मीं में तिरा हाला तो नहीं हूँ

बाग़ों से उड़ाई हुई ख़ुश्बू ही सही तू
मैं निकहत-ए-बे-बाक का पर्दा तो नहीं हूँ

मैं अक्स-ए-गुरेज़ाँ तो नहीं अपनी अना का
मैं तेरा ही टूटा हुआ रिश्ता तो नहीं हूँ

मैं आख़िरी जादू तो नहीं साहिर-ए-शब का
सहमा हुआ मैं सुब्ह का तारा तो नहीं हूँ