टूट गया हवा का ज़ोर सैल-ए-बला उतर गया
संग-ओ-कुलूख़ रह गए लहर गई भँवर गया
वो भी अजीब दौर था दिल का चलन ही और था
शाम हुई तो जी उठा सुब्ह हुई तो मर गया
किस के बंधे हुए थे हम दामन-ए-माहताब से
हम भी उधर उधर गए चाँद जिधर जिधर गया
कितने रफ़ीक़-ओ-हम-सफ़र जिन की मिली न कुछ ख़बर
किस के क़दम उठे किधर कौन कहाँ पसर गया
बुझ गई रौनक़-ए-बदन उड़ गया रंग-ए-पैरहन
जान उमीद-वार-ए-मन वक़्त बहुत गुज़र गया
ग़ज़ल
टूट गया हवा का ज़ोर सैल-ए-बला उतर गया
अहमद मुश्ताक़

