तुझे कुछ याद है पहला वो आलम इश्क़-ए-पिन्हाँ का
शिगाफ़-ए-पर्दा से क्या था इशारा चश्म-ए-फ़त्ताँ का
सुना है कब ये छुटती है पकड़ गोशा न दामाँ का
समझ काजल न फैला साया है तेरी ही मिज़्गाँ का
यहाँ दम खींचना दो दोपहर मुश्किल है हो जाता
धुआँ घटता है जब सीने में अपनी आह-ए-सोज़ाँ का
न की ग़म्ज़ा ने जल्लादी न उन आँखों ने सफ़्फ़ाकी
जिसे कहते हैं दिल अपना वही क़ातिल हुआ जाँ का
शिगाफ़-ए-सीना से अज़-बस-कि दूद-ए-दिल निकलता है
सियह अब जा-ब-जा से रंग है अपने गरेबाँ का
ये दिल है क़तरा-ए-ख़ूँ से भी कम अल्लाह री जुरअत
हुआ है तिसपे रू-कश उस ख़दंग अंदाज़ मिज़्गाँ का
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ग़ज़ल
तुझे कुछ याद है पहला वो आलम इश्क़-ए-पिन्हाँ का
ममनून निज़ामुद्दीन