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तुझे भी जांचते अपना भी इम्तिहाँ करते | शाही शायरी
tujhe bhi jaanchte apna bhi imtihan karte

ग़ज़ल

तुझे भी जांचते अपना भी इम्तिहाँ करते

मज़हर इमाम

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तुझे भी जांचते अपना भी इम्तिहाँ करते
कहीं चराग़ जलाते कहीं धुआँ करते

कई थे जल्वा-ए-नायाब तुझ से पहले भी
किस आसरे पे तिरा नक़्श जावेदाँ करते

सफ़ीना डूब रहा था तो क्यूँ न याद आया
तिरी तलब तिरे अरमाँ को बादबाँ करते

मोहब्बतें भी तिरी हैं शिकायतें भी तिरी
यक़ीन तुझ पे न होता तो क्यूँ गुमाँ करते

हवा थी तेज़ जलाते रहे दिलों में चराग़
कटी है उम्र लहू अपना राएगाँ करते

वो बे-जहत का सफ़र था सवाद-ए-शाम न सुब्ह
कहाँ पे रुकते कहाँ याद-ए-रफ़्तगाँ करते

दयार-ए-ख़्वाब में ठहरे हिसार-ए-गुल में रहे
मगर ये ग़म ही रहा ख़ुद को शादमाँ करते