तुझ को किस मुँह से बेवफ़ा कहिए
कोई पूछे सबब तो क्या कहिए
हम से कुछ वक़्त पर न बन आई
ले गए दिल वो मुफ़्त क्या कहिए
मुझ को समझा के गालियाँ दीजे
फ़िक़रा फ़िक़रा जुदा जुदा कहिए
न मैं आशिक़ न आप को क्या हूँ
ग़ैर से अपना मुद्दआ' कहिए
जान देता हूँ किस ख़ुशी से मैं
आज तो आप मर्हबा कहिए
आइना मैं दिखा के कहता हूँ
आप ही हैं कि दूसरा कहिए
अब न कीजे मूए पे सौ दुर्रे
अब न आशिक़ को बा-वफ़ा कहिए
ग़ज़ल
तुझ को किस मुँह से बेवफ़ा कहिए
आशिक़ अकबराबादी

